राजस्थान की मुख्यमंत्री एवं मंत्रीमंडल 2018 (Rajasthan Ministers List in Hindi 2018)

राजस्थान की मुख्यमंत्री एवं मंत्रीमंडल :- 

Rajasthan Ministers List in Hindi 2018
·         गुलाबचंद कटारिया : गृह एवं नागरिक सुरक्षा मंत्री, कारागार, न्याय, आपदा एवं सहायता
·         हेम सिंह भडाऩा : जीएडी मंत्री, मोटर गैराज, संपदा, मुद्रण एवं लेखनबाबूलाल वर्मा: खाद्य एवं नागरिक आपूतिज़्, उपभोक्ता मामलात विभाग
·         सुरेंद्र गोयल : पीएचईडी, भू-जल
·         यूनुस खान : परिवहन, पीडब्लूडी
·         कालीचरण सराफ : चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री, ईएसआई, चिकित्सा शिक्षा, आयुर्वेद 
·         प्रभुलाल सैनी : कृषि एवं पशुपालन, उद्यानिकी, मत्स्य
·         अजय सिंह किलक : सहकारिता विभाग, गोपालन
·         राजपाल सिंह शेखावत : उद्योग, अप्रवासी भारतीय, राजकीय उपक्रमए डीएमआईसी विभाग
·         डॉ. जसवंत यादव : श्रम, नियोजन व कारखाना व बॉयलर्स निरीक्षण विभाग
·         नंदलाल मीणा : जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग
·         डॉ. रामप्रताप : जलसंसाधन, इंदिरा गांधी नहर परियोजना, कृषि सिंचित क्षेत्र व जल उपयोगिता
·         गजेंद्र सिंह खींवसर : खेल व युवा मामले, वन एवं पर्यावरण
·         डॉ. अरुण चतुर्वेदी : सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता, अल्पसंख्यक, वक्फ  विभाग
·         राजेंद्र राठौड़ : संसदीय कार्य, ग्रामीण विकास मंत्री, निर्वाचन विभाग
·         किरण माहेश्वरी : उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, संस्कृत शिक्षा
·         श्रीचंद कृपलानी : यूडीएच मंत्री, स्वायत्त शासन
·         हेम सिंह भडाऩा : जीएडी मंत्री, मोटर गैराज, संपदा, मुद्रण एवं लेखन
राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)
·         अमराराम : राजस्व, उपनिवेशन, सैनिक कल्याण, पुनर्वास, जयपुर शहर पुनर्वास, पुन: बंदोबस्त विभाग
·         सुरेंद्र पाल सिंह : खान विभाग
·         अनीता भदेल : महिला एवं बालविकास विभाग
·         वासुदेव देवनानी : शिक्षा- प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा, भाषा विभाग
·         राजकुमार रिणवा : देवस्थान विभाग
·         कृष्णेंद्र कौर दीपा : कला एवं पर्यटन, पुरातत्व, नागरिक उड्‌डयन
·         वासुदेव देवनानी (केवल राज्यमंत्री के रूप में ) : ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज, इसके अधीन प्राथमिक शिक्षा का स्वतंत्र प्रभार
राज्यमंत्री
·         कमसा मेघवाल : जनजातीय क्षेत्रीय विकास विभाग
·         ओटाराम देवासी : गोपालन विभाग
·         बंशीधर: चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, ईएसआई, चिकित्सा शिक्षा, आयुर्वेद
·         सुशील कटारा : जलदाय , भू-जल
·         पुष्पेंद्र सिंह राणावत : ऊर्जा, विधि एवं विधिक कार्य, विधि परामर्शी
·         धनसिंह रावत : पंचायती राज, ग्रामीण विकास, संसदीय मामलात, निर्वाचन विभाग

राजस्थान का परिचय rajasthan GK

राजस्थान का परिचय :- 

क्षेत्रफल के आधार पर राजस्थान (Rajasthan) भारत का सबसे बड़ा राज्य है। राजस्थान कि सीमाऐ कुछ इस प्रकार है - इसके पश्चिम में पाकिस्तान, दक्षिण-पश्चिम में गुजरात, दक्षिण-पूर्व में मध्यप्रदेश, उत्तर में पंजाब (भारत), उत्तर-पूर्व में उत्तर प्रदेश और हरियाणा है ।

राजस्थान देश के उत्तर पश्चिम में स्थित है। छठी सताब्दी के बाद राजस्थानी भू भाग में राजपूत राज्यों का उदय प्रारंभ हुआ । राजपूत राज्यों की प्रधानता के कारण इसे राजपुताना कहा जाने लगा ।
वाल्मीकि ने राजस्थान प्रदेश को ‘मरुकांतर’ कहा है। राजस्थान शब्द का प्राचीनतम उपयोग ‘राजस्थानियादित्य’ वि संवत 682 में उत्कीर्ण वसंतगढ़ (सिरोही ) के शिलालेख में मिलता है । उसके बाद मुहणोत नैणसी की ख्यात व राजरूपक में राजस्थान शब्द का प्रयोग हुआ है , परन्तु इस भाग के लिए राजपूताना शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1800 ईसवी में जॉर्ज थॉमस द्वारा किया गया था । कर्नल जेम्स टॉड ने इस राज्य को “रायथान” कहा क्योंकि स्थानीय साहित्य एवं बोलचाल में राजाओं के निवास के प्रान्त को ‘रायथान’  कहते थे। उन्होंने 1829 ईसवी में लिखित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “Annals and antiquities of Rajas’Than( or central and Western Rajpoot States of India) में सर्वप्रथम इस भौगोलिक भाग के लिए राजस्थान(Rajasthan) शब्द का प्रयोग किया ।
स्वतंत्रता के पश्चात 26 जनवरी 1950 को ओपचारिक रूप से इस प्रदेश का नाम राजस्थान स्वीकार किया गया । राजस्थान अपने वर्तमान स्वरुप में 1 नवम्बर 1956 को आया। इससे पुर्व राजस्थान निर्माण के विभिन्न चरणों से गुजरा ।
  • राजस्थान की स्थापना 1 नबम्वर 1956 को हुई थी
  • राजस्थान की राजधानी जयपुर (Jaipur) है
  • राजस्थान का क्षेञफल 342239 किमी है
  • राजस्थान की राजकीय भाषा हिंदी और राजस्थानी है
  • राजस्थान के सबसे बडे शहर अजमेर, अलवर, भरतपुर, जयपुर हैं
  • राजस्थान में जिलों की संख्या 33 है
  • राजस्थान की प्रमुख गेहूं, बाजरा, जवार, मक्का, जौ, चावल, दालें, सरसाें, मूंगफली, तिल, अलसी, कपास, आदि हैं
  • राजस्थान देश का सबसे बडा तीसरा नमक उत्पादक क्षेञ है
  • राजस्थान की राजकीय पेड खेजरी है
  • राजस्थान की राजकीय पक्षी इंडियन बस्टर्ड है
  • राजस्थान की प्रमुख नदियां व्यास, चंबल, बनास, और लुनी हैं
  • राजस्थान में लोकसभा की 25 और राज्यसभा 10 सीटें हैं
  • राजस्थान की राजकीय फूल रोहिरा है
  • जनसंख्या की नजर से राजस्थान भारत का 8 वां राज्य है
  • राजस्थान में सडकों की कुुल की लंबाई 186806 किमी हैं
  • राजस्थान की राजकीय पशु चिंकारा है
  • राजस्थान मुख्यत: एक कृषि व पशुपालन प्रधान राज्य है और अनाज व सब्जियों का निर्यात करता है
  • अरावली पर्वतमाला को राज्य की 'रीड की हड्डी' कहा जाता है
  • अरावली पर्वतमाला राज्य को दो जलवायवीय भागों में विभाजित करती हैं।
  • स्वतंत्रता के समय राजस्थान में 19 देशी रियासतें,3 ठिकाने तथा अजमेर-मेरवाड़ा (चीफ कमिशनर द्वारा शासित ) थे।
  • अजमेर-मेरवाड़ा के प्रथम एवम एकमात्र मुख्यमंत्री श्री हरिभाऊ उपाध्याय थे।राजस्थान का एकीकरण 7 चरणों में पूर्ण हुआ
  • 18.1नवम्बर,1956 ई. को राजस्थान अपने वर्तमान स्वरूप में आया।

व्यक्तित्व (personality) का अर्थ , परिभाषा , प्रकार Part III

पर्यावरण सम्बन्धी निर्धारक
1      प्राकृतिक निर्धारक
मनुष्य प्राकृतिक पर्यावरण में रहता है उसके जीवन तथा व्यक्तित्व पर भौगोलिक परिस्थितियों एवं जलवायु का प्रभाव पड़ता है। भौगोलिक परिस्थितियों और जलवायु का उसके स्वास्थ्य, शरीर की बनावट तथा मानसिक स्थितियों पर प्रभाव पड़ता है। जैसे ठण्डी जलवायु में रहने वाले व्यक्तियों का रंग गोरा होता है जबकि गर्म जलवायु में रहने वाले व्यक्ति सांवले रंग के होते हैं। भौगोलिक परिस्थितियों का भी शारीरिक गठन पर प्रभाव पड़ता है जैसे पहाड़ी लोगों का शारीरिक गठन। जिन जगहों पर भूकम्प या प्राकृतिक आपदाएं ज्यादा होती हो वहां के लोगों में सुरक्षा की भावना कम होती है। यदि व्यक्ति की भौगोलिक परिस्थितियाँ याजलवायु बदल दी जाये तब उनके व्यक्तित्व में भी परिवर्तन आ जाता है। जैसे ऊष्ण प्रदेश में रहने वाले लोगों को शीत प्रदेश में रखा जाए तो उनके कार्य करने की क्षमताएं घट सकती हैं और स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। इसी तरह ठण्डे प्रदेश में रहने वाले व्यक्तियों को यदि ऊष्ण प्रदेश में रखा जाए तो ऐसा ही प्रभाव उन लोगों पर पड़ता है।

2.    सामाजिक निर्धारक
व्यक्ति सामाजिक प्राणी है और समाज की इकाई भी। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त वह समाज में रहता है। अतः समाज का, समाज की संरचना का और समाज के लोगों का उस पर बहुत प्रभाव पड़ता है। परिवार के लोगों से लेकर समाज के लोगों तक का व्यक्ति के व्यक्तित्व पर किस प्रकार प्रभाव पड़ता है

परिवार या घर का प्रभाव

•           (१) माता-पिता का प्रभाव - सभी मनोवैज्ञानिकों का यह मानना है कि व्यक्तित्व के विकास में घर के परिवेश का बड़ा प्रभाव पड़ता है। परिवार के सदस्यों का भी बालक के व्यक्तित्व के विकास पर प्रभाव पड़ता है। जन्मकाल से ही मनुष्य का व्यक्तित्व का विकास प्रारम्भ हो जाता है। जन्म के समय उसकी माता तक ही उसका परिवार सीमित रहता है। उसे अपने सभी प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी माता पर निर्भर रहना पड़ता है। अतः माता के विवेकशील और व्यवहार कुशल रहने पर तथा बालक को सही ढंग से देखभाल करने से सन्तान या बालक का व्यक्तित्व विकास उचित ढंग से होता है। शिवाजी, महाराणा प्रताप जैसे महापुरुषों के व्यक्तित्व विकास का श्रेय उनकी माताओं को है। माता-पिता द्वारा आवश्यकताओं की उचित पूर्ति होने से बालक आगे चलकर आशावादी, कर्मवीर व परोपकारी बनता है, किन्तु माता-पिता द्वारा आवश्यकताओं की उचित पूर्ति न करने से तथा पर्याप्त स्नेह न देने से बालक कर्महीन व निराशावादी बन जाता है। बाल्यकाल में तिरस्कृत रहने पर वह हीन भाव एवं असुरक्षित भाव से पीड़ित रहता है तथा उसमें आत्मविश्वास की कमी रहती है। आगे चलकर वह परावलम्बी स्वभाव का हो जाता है। वह अपनी छोटी-छोटी आवश्यकताओं को पूर्ति के लिए भी दूसरों का मुंह देखता रहता है। फलस्वरूप उसके व्यक्तित्व का विकास उचित दिशा में नहीं होता।
माता-पिता के प्रेम के अभाव का सभी बालकों पर एक सा प्रभाव पड़ता है क्योंकि इसमें बालक के जन्मजात स्वभाव और प्रवृत्तियों का बड़ा महत्व है। माता-पिता के प्रेम की अवहेलना और ताड़ना से एक बालक दब्बू बन सकता है परन्तु दूसरा बालक दबंग और उद्दंड बन सकता है। आलपोर्ट के अनुसार ‘‘वहीं आग जो मक्खन को पिघलाती है अण्डे को कठोर बनाती है।’’ माता-पिता द्वारा बच्चे को झिड़कना और गोद में न लेना भी उसके व्यक्तित्व को प्रभावित करता है।
•           (२) घर के अन्य सदस्यों का प्रभाव - बालक के व्यक्तित्व पर घर के अन्य सदस्यों का काफी प्रभाव पड़ता है। घर में रहने वाले दादा-दादी या नाना-नानी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची, मामा-मामी, बड़े भाई-बहन या अन्य कोई रिश्तेदार जो उसके परिवार में रहते हो, का प्रभाव बालक के व्यक्तित्व के विकास पर पड़ता है। बालक इनके व्यवहारों को देखता है और सीखता है। कालान्तर में ये व्यवहार उसके व्यक्तित्व का एक भाग बन जाता है। परिवार में बड़े लोग बालक के सामने आदर्श के समान होते हो बालक उन जैसा बनना चाहता है और वह तादाम्य क्रिया अपनाता है। यदि परिवार में बालक इकलौती सन्तान है तो परिवार में उसे आवश्यकता से अधिक लाड़-प्यार मिलता है फलस्वरूप वह जिद्दी व शरारती हो जाता है। बच्चे के लिए शरारती होना एक आवश्यक गुण है और इससे आगे चलकर वह निर्भीक व साहसी बनता है परन्तु आवश्यकता से अधिक शरारती होने से वह नियंत्रण की सीमा तोड़ देता है और वह समाज विरोधी व्यवहारों को सीखकर उसमें रुचि रखने लगता है। अतः उसका व्यक्तित्व विकास उचित रूप से नहीं हो पाता। यदि परिवार बड़ा है, संयुक्त परिवार है, उसके सदस्यों के व्यवहारों में समायोजन नहीं है, घर में कलहपूर्ण स्थिति रहती है तो उसका प्रभाव बालक के व्यक्तित्व के विकास पर पड़ेगा और बालक का समायोजन आगे चलकर गड़बड़ा सकता है।
यदि परिवार के सदस्यों में आपराधिक प्रवृत्तियां हो तो उसका प्रभाव भी बालक के व्यक्तित्व के विकास पर पड़ता है और बालक में भी आपराधिक प्रवृत्तियां जन्म लेती हो और आगे चलकर वह बालक सामाजिक अपराध करने लगता है। इसी प्रकार भग्न परिवार (Broken Family) भी किशोर अपराध का मुख्य कारण है।
•           (३) जन्म क्रम का प्रभाव - प्रायः यह बात आमतौर पर स्पष्ट है कि परिवार के छोटे-बड़े, सबसे बड़े या सबसे छोटे आदि विभिन्न क्रम के बालकों के प्रति एक सा व्यवहार नहीं किया जाता। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिकएल्फ्रैड एडलर के अनुसार परिवार में बालक के जन्मक्रम का उसके व्यक्तित्व पर बड़ा प्रभाव पड़ता है, उसकी शारीरिक स्थिति तथा उसके कार्यशैली पर भी प्रभाव पड़ता है। सबसे छोटा बालक सभी से लाड़-प्यार पाता है अतः वह दूसरों पर अत्यधिक निर्भर बन जाता है। सबसे बड़ा बालक स्वावलम्बी व निर्दयी बन जाता है, क्योंकि कुछ दिन तक इकलौते रहने के कारण न तो कोई उसकी चीजों में हिस्सा बांटता है और न कोई उसका अधिकार छीनने वाला होता है परन्तु दूसरे बालक के जन्म से पहले बालक के मन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है क्योंकि इससे उसका एकाधिकार छिन जाता है और कभी-कभी तो उसकी अवहेलना होने लगती है। अतः वह छोटे बालक के प्रति ईर्ष्या करने लगता है और अपना अधिकार बनाये रखने की कोशिश करता है। अनुसंधानकर्त्ताओं ने प्रत्येक जन्मक्रम में बालक में एकसी व समान संख्याओं में उलझनें पायी हैं। एडलर के इस कथन में बहुत कुछ सत्यता है कि व्यक्ति अपनी जीवन शैली बहुत कुछ परिवार में प्रारम्भिक जीवन से ही निश्चित कर लेता है, परन्तु यह मानने के निश्चित
प्रमाण नहीं हो कि बचपन की यह शैली आजीवन अपरिवर्तित रहती है।
विद्यालय का प्रभाव
बालक के व्यक्तित्व विकास पर विद्यालय, विद्यालय में होने वाले अध्ययन, विद्यालय के शिक्षक, बालक के सहपाठी तथा विद्यालय की भौगोलिक स्थिति का बहुत प्रभाव पड़ता है।
(१) पद्धशिक्षा का प्रभाव - विद्यालय में शिक्षा किस प्रकार की दी जाती है इसका प्रभाव बालक के व्यक्तित्व पर पड़ता है। कई विद्यालयों में धार्मिकता, कट्टरधार्मिकता की शिक्षा दी जाती है इससे बालक के व्यक्तित्व का विकास संकीर्णन और एक निश्चित धर्म की तरफ होता है। इससे बालक दूसरे धर्मों के प्रति ईर्ष्या और द्वेष करने वाला बन जाता है। कई अंग्रेजी भाषा के विद्यालयों में बालक को मातृभाषा या अन्य भाषाएं बोलने नहीं दी जाती, बल्कि केवल अंग्रेजी भाषा ही बोलने को बाध्य किया जाता है, ऐसी स्थिति में बालक पर मानसिक दबाव बढ़ जाता है तथा उसमें निराशा एवं कुण्ठाएं उत्पन्न हो जाती है, जिससे आगे चलकर बालक के व्यक्तित्व विकास में तथा समायोजन में बाधा आती है।
कई विद्यालयों में संतुलित शिक्षा नहीं दी जाती। आज की शिक्षा प्रणाली में यह सबसे बड़ा दोष है। बालक के मानसिक और शारीरिक विकास पर समुचित ध्यान नहीं दिया जाता बल्कि उसके पाठ्यक्रम की कितनी ज्यादा पुस्तकें बढ़ाई जाये इस पर ध्यान दिया जाता है। बालक के बस्ते का बोझ, गृह कार्य की मार बालक के सर्वांगीण विकास में बाधक बनती है। और उसके सन्तुलित व्यक्तित्व विकास, सर्वांगीण विकास और मूल्यों के विकास के लिए विद्यालय में संतुलित एवं नैतिक शिक्षा दी जानी चाहिए। प्रायोगिक आधारित शिक्षा मूल्य-परक शिक्षा, अनेकान्त धार्मिक शिक्षा तथा शारीरिक विकास की शिक्षा भी बालक के व्यक्तित्व के विकास में बहुत सहायक होती है।
(२) शिक्षकों का प्रभाव - जिस प्रकार बालक परिवार में माता या पिता से तादात्म्य कर लेता है उसी प्रकार विद्यालय में भी शिक्षकों से तादात्म्य कर लेता है। यदि शिक्षक का व्यक्तित्व प्रभावशाली हो तो बालक के व्यक्तित्व विकास पर उसका अनुकूल प्रभाव पड़ता है। कई बार बालक शिक्षकों के नकारात्मक गुणों को सीख जाता है। शिक्षकों द्वारा बालकों से बीड़ी, सिगरेट मंगवाना और उनकी उपस्थिति में उनका प्रयोग करना घातक है क्योंकि इसका तादाम्य कर बालक बीड़ी, सिगरेट पीना सीख जाता है। यदि शिक्षकों में अच्छे गुण हो तो बालक भी उन गुणों का तादात्म्य कर लेता है, फलस्वरूप बालक के व्यक्तित्व विकास में वे गुण जुड़ जाते हैं। संक्षेप में आमतौर से बालक के प्रति व्यवहार में प्रकट होने वाले शिक्षक के व्यक्तित्व के सभी गुण-दोष बालक के व्यक्तित्व विकास पर अच्छा-बुरा प्रभाव डालते हैं।
(३) सहपाठियों का प्रभाव - बालक के व्यक्तित्व विकास पर उसके सहपाठियों या विद्यालय के साथियों का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। विद्यालय में उसको सभी प्रकार के साथियों के साथ रहना पड़ता है। कई सहपाठी आयु में उससे भिन्न होते हो, कई स्नेह करने वाले तो कई निर्दयी विद्यार्थी भी उसके साथ होते हैं। इन सभी साथियों के साथ बालक अपनी विद्यालय की दिनचर्या व्यतीत करता है। छोटी आयु या छोटी कक्षा का विद्यार्थी बड़े विद्यार्थी से दबता है। यह दबना आदर्श सूचक भी हो सकता है और भय सूचक भी। अतः इन कारकों का प्रभाव बालक के व्यक्तित्व पर पड़ता है। कई बार बालक अभद्र बालकों के व्यवहारों को सीख जाता है जिसमें गाली-गलौच, विद्यालय से भागने, शिक्षकों तथा माता-पिता के साथ अभद्र व्यवहार करना सीख जाता है, जो उसके व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित करता है। सहपाठियों का बालक के व्यक्तित्व पर सबसे अधिक प्रभाव खेल-क्रीड़ा समूह के प्रभाव के रूप में पड़ता है। विद्यालय में साथ-साथ खेलने वाले या प्रतियोगिता करने वाले विद्यार्थी अपना-अपना बालक का जिस संस्कृति के परिवेश में विकास होता है उस संस्कृतिके खान-पान, रहन-सहन, रीति-रिवाज, धर्म, परम्परा, विवाह, सामाजिक समारोह और सामाजिक संस्थाओं आदि का प्रभाव पड़ता है। जनजातियों की संस्कृति में भी भारी भिन्नताएं हैं। जैसे नागा लोग सिरों के शिकारी (Head Choppers) है तथा भील लड़ाकू है और संथाल सीधे-साधे हैं। इस तरह सांस्कृतिक परिवेश में सामाजिक रचना, सामाजिक स्थितियां, सामाजिक कार्य तथा नियम संहिताएं मनुष्य के व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं।
कहीं-कहीं छात्र दल बना लेते हैं और दल के नेतृत्व के लिए नेता का चुनाव भी करते हैं। इस तरह विभिन्न क्रियाओं का संचालन करने के लिए छात्र दल अलग-अलग ढंग से कार्य करता है जो उसके व्यक्तित्व विकास में सहायक है। अपने साथियों के साथ में प्रतियोगिता और प्रतिद्वन्द्विता रखने से बालक परिश्रम करता है जो उसके व्यक्तित्व विकास में सहायक होता है।
(४) विद्यालय की भौगोलिक स्थिति - विद्यालय की भौगोलिक स्थिति कैसी है, इसका प्रभाव भी बालक के व्यक्तित्व के विकास पर पड़ता है। विद्यालय कहां स्थित है तथा विद्यालय भवन की क्या स्थिति है, इसका भी प्रभाव बालक के व्यक्तित्व विकास पर पड़ता है। यदि विद्यालय प्रदूषण जनित जगह पर स्थित है, जहां वायु प्रदूषण तथा ध्वनि प्रदूषण हो तो ऐसे विद्यालय में अध्ययन करने वाले बालकों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। यदि विद्यालय ऐसे मोहल्ले में स्थित है जहां समाज कंटक जैसे शराबी, जुआरी, वेश्यावृत्ति करने वाले और चोरी करने वाले रहते हो तो ऐसे क्षेत्र के विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों के व्यक्तित्व विकास पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। इसमें बालक समाज विरोधी व्यवहार सीख सकता है।
यदि विद्यालय का भवन स्वच्छ नहीं है और जीर्ण-शीर्ण और खण्डहर अवस्था में है तो उस स्थान पर पढ़ने वाले बालकों के व्यक्तित्व के विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है। उनके मन में हर समय भवन के ढह जाने का भय रहता है तथा उनमें अन्य व्याधियां भी उत्पन्न हो सकती हो जो उनके व्यक्तित्व विकास में बाधक होते हैं।
3.    समाज का प्रभाव
जैसा कि पूर्व में लिखा जा चुका है कि व्यक्ति समाज का अंग और इकाई है। अतः समाज का व्यक्तित्व विकास पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। समाज की परम्पराओं रीति-रिवाजों, सामाजिक नियमों का व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति समाज के लोगों के आचरण तथा प्रतिमानों को अपनाता है। जाति, वर्ण तथा व्यवसाय के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति की समाज में स्थिति अलग-अलग होती है। परिवार की सामाजिक स्थिति से बालकों के व्यक्तित्व पर भी प्रभाव पड़ता है। वर्णभेद जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा जातिभेद अर्थात् विभिन्न जातियों की सामाजिक स्थितियां भिन्न-भिन्न हैं। कुछ लोग जाति-प्रथा, पर्दा-प्रथा, बाल विवाह के पक्षधर होते हो तो कुछ घोर विरोधी। कुछ लोग समाज के प्रत्येक नियम को तोड़ने को तत्पर दिखाई देते हो जबकि कुछ लोग उनका कठोरता से पालन करते दिखाई पड़ते हैं। ऊंची जाति के बालकों में बड़प्पन की भावना और नीची जातियों में हीनता की भावना देखी जा सकती है। ऊंचे घरानों के बालकों का व्यक्तित्व संयमित दिखाई पड़ता है परन्तु इसके लिए कोई ठोस मनोवैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
बालक के व्यक्तित्व के विकास पर समाज सुधारकों, सामाजिक कार्यकर्त्ताओं तथा समाज विरोधी व्यक्तियों का भी प्रभाव पड़ता है। समाज सुधारक, समाज सेवी तथा सामाजिक कार्यकर्त्ता समाज के कल्याण तथा समाज के उत्थान के लिए कार्य करते हैं और इनका प्रभाव बालकों के व्यक्तित्व विकास पर पड़ता है। इसी तरह समाज विरोधी कार्य करने वाले और सामाजिक कंटकों का भी प्रभाव व्यक्तित्व विकास पर पड़ता है। समाज विरोधी लोग (या समाज कंटक), समाज विरोधी कार्य जैसे जेबकतरी (पॉकिट मार), चोरी, शराबखोरी, वेश्यावृत्ति आदि कार्यों को करते हो और इनका प्रभाव बालकों के व्यक्तित्व विकास पर पड़ता है। समाज-सेवक समाज के विभिन्न लोगों जैसे वृद्ध, निराश्रित, गरीब की सेवा करते हो और समाज की सुरचना करने का प्रयत्न करते हैं। उनकी परोपकारी सेवा भावनाओं का भी प्रभाव अन्य व्यक्तियों के व्यक्तित्व विकास पर पड़ता है। अन्य व्यक्ति भी परोपकारी भावनाओं को अपनाकर अपने व्यक्तित्व का सकारात्मक विकास कर सकते हैं।
4.    सांस्कृतिक निर्धारक
व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास पर संस्कृति की अहम भूमिका है। व्यक्ति का व्यक्तित्व संस्कृति के अनुरूप होता है। जन्मकाल से ही शिशु का पालन-पोषण तथा समाजीकरण उसकी सांस्कृतिक परम्परा के अनुरूप होता है। प्रत्येक संस्कृति में शिशु के सामाजीकरण की एक विधि होती है क्योंकि इसी विधि के द्वारा संस्कृति अपने को सुरक्षित रखती है। संस्कृति और व्यक्तित्व एक दूसरे के पूरक होते हैं। आज के अधिकतर मनोवैज्ञानिकों का यह विचार है कि संस्कृति और व्यक्तित्व दो भिन्न वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि एक ही वस्तु के दो पहलू हैं। जिस संस्कृति में बालक का लालन-पालन होता है उसी संस्कृति के गुण उसके व्यक्तित्व में आ जाते हैं।
मैकाईवर और पेज (Mac Iver and Page) के शब्दों में ‘‘संस्कृति हमारे रहने व सोचने के ढंगों में, दैनिक कार्यकलापों में, कला में, साहित्य में, धर्म में, मनोरंजन और सुखोपभोग में हमारी प्रकृति की अभिव्यक्ति है।’’ इस तरह संस्कृति कार्य करने की शैलियों, मूल्यों, भावात्मक लगावों और बौद्धिक अभियान का क्षेत्र है। एक संस्कृति दूसरी संस्कृति से इन्हीं गुणों के आधार पर भिन्न होती है। अलग-अलग संस्कृतियों के अलग-अलग मूल्य होते हैं। जैसे-प्राचीन काल में भारतीय लोग धर्मपरायण और आध्यात्मिक थे। आधुनिक भारतीय उतने आध्यात्मिक एवं धार्मिक नहीं हैं। फिर भी उनमें आध्यात्मिक एवं धार्मिक मूल्य उच्च स्तर के हैं। इसका कारण भारतीय संस्कृति का प्रभाव ही है। पाश्चात्य लोगोके लिए भौतिक व मानसिक मूल्य उच्च स्तर के हैं। इसी तरह अलग-अलग संस्कृति के समाजों में रहन-सहन, रीति-रिवाज, धर्म, कला, मूल्यों और परम्पराओं में भिन्नताएं देखी जा सकती हैं। कुछ संस्कृतियों की जातियों में मनुष्य हत्या को पाप समझते हैं तो दूसरी ओर नागा संस्कृति में उन लोगों का बड़ा सम्मान होता है जो नर मुण्ड काट के लाते है। जो व्यक्ति जितने ज्यादा नर मुण्ड काटता है उतनी ही समाज में उसकी प्रतिष्ठा बढ़ती है और उतने ही ज्यादा स्त्रियों के विवाह के प्रस्ताव आते हैं। जबकि दूसरी संस्कृति में नर हत्या करने वाले के साथ समाज के लोग अपनी बेटी का विवाह नहीं करना चाहते। भारतीय संस्कृति के कुछ परिवारों में तलाक देना अच्छा नहीं माना जाता परन्तु कुछ जनजातियों में जो स्त्री जितने अधिक तलाक पाती है, उसकी प्रतिष्ठा उतनी ही अधिक बढ़ती है। पाश्चात्य देशों में तलाक को बुरा नहीं माना जाता है। कुछ समाज में कुंआरी कन्या के गर्भवती हो जाने पर कोई उससे विवाह नहीं करता, परन्तु कुछ जन-जातियों में विवाह से पहले संतानोत्पत्ति करना लड़की के विवाह में सहायक होता है। इस तरह की सांस्कृतिक भिन्नताएं बालक के व्यक्तित्व के विकास पर प्रभाव डालती है


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